नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026। मिडिल ईस्ट में संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार में पैदा हुआ संकट अब भी कीमतों पर असर डाल रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति में सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान की इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर पकड़ कमजोर हुई है और तेल की सप्लाई लौटने के बावजूद कीमतों में राहत क्यों नहीं मिल रही।
फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इससे वैश्विक बाजार में सप्लाई की कमी और कीमतों में तेजी देखने को मिली। अब कुछ आपूर्ति मार्गों पर आवाजाही बहाल होने के बावजूद क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम बने हुए हैं।
क्या होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण कमजोर हुआ है?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2025 में इस मार्ग से औसतन करीब 2 करोड़ बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते थे।
संघर्ष के दौरान जहाजों की आवाजाही बाधित होने से ईरान को इस समुद्री मार्ग के जरिए वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बनाने की रणनीतिक क्षमता मिली। हालांकि, अक्टूबर की शुरुआत तक उपलब्ध रिपोर्टों में कच्चे तेल का निर्यात काफी हद तक युद्ध से पहले के स्तर के करीब लौटने की बात कही गई।
इसके बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरान ने इस मार्ग पर अपना प्रभाव पूरी तरह खो दिया है। जहाजों की आवाजाही, सुरक्षा की स्थिति और ऊर्जा आपूर्ति पर जोखिम अभी भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर रहे हैं।
तेल की सप्लाई लौटने के बाद भी कीमतें ऊंची क्यों?
कच्चे तेल की कीमतें केवल उपलब्ध बैरल की संख्या से तय नहीं होतीं। बाजार भविष्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका, जहाजों की सुरक्षा, बीमा और माल ढुलाई की लागत तथा भू-राजनीतिक घटनाक्रम को भी कीमतों में शामिल करता है।
होर्मुज के आसपास हमलों और तनाव की खबरों से व्यापारियों को आशंका रहती है कि तेल की आवाजाही फिर प्रभावित हो सकती है। इस जोखिम के कारण कीमतों में अतिरिक्त प्रीमियम बना रह सकता है, भले ही मौजूदा सप्लाई में सुधार हो रहा हो।
इसके अलावा, कच्चे तेल की सप्लाई और डीजल जैसे तैयार ईंधन की उपलब्धता एक जैसी नहीं है। क्षेत्र से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति पर दबाव बना रहने से डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों में राहत आने में समय लग सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। इसलिए खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति, जहाजों की आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ सकता है।
सितंबर 2026 में भारत का कच्चे तेल का आयात बढ़कर करीब 52.6 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया था। इस दौरान खाड़ी देशों से आपूर्ति में वृद्धि दर्ज की गई। इससे भारत को तेल के अलग-अलग स्रोतों से खरीद जारी रखने में मदद मिली।
लेकिन यदि वैश्विक कीमतें ऊंची रहती हैं, तो भारत को तेल आयात के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ सकता है। इसका असर रुपये, चालू खाते के संतुलन, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ने की आशंका रहती है। वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं और भारत किन स्रोतों से कितनी मात्रा में तेल खरीद पाता है।
आगे तेल की कीमतों की दिशा क्या तय करेगी?
आने वाले दिनों में तेल बाजार की दिशा मुख्य रूप से अमेरिका-ईरान के बीच घटनाक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा, खाड़ी देशों से वास्तविक आपूर्ति और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी।
यदि तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही लगातार सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों पर दबाव घट सकता है। लेकिन हमलों या नए प्रतिबंधों से सप्लाई का जोखिम बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी आ सकती है।
निष्कर्ष: होर्मुज से तेल की आवाजाही में सुधार एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इससे ऊर्जा संकट का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए कीमतों में स्थिरता केवल सप्लाई लौटने पर नहीं, बल्कि क्षेत्र में भरोसेमंद और सुरक्षित परिवहन बहाल होने पर भी निर्भर करेगी।
