नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि यदि मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत में महंगाई का दबाव फिर बढ़ सकता है। भारत ने वैकल्पिक देशों से तेल की आपूर्ति बढ़ाकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में आई बाधाओं का सामना किया है, लेकिन लंबे समय तक महंगा तेल अर्थव्यवस्था, कारोबार और आम लोगों के घरेलू बजट पर असर डाल सकता है।
IMF की अक्टूबर 2026 की एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सहित कई बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने मिडिल ईस्ट के बाहर से तेल खरीदकर आपूर्ति में आई बाधाओं के असर को कम करने की कोशिश की है। हालांकि, आपूर्ति में सुधार का मतलब यह नहीं है कि ऊंची वैश्विक कीमतों का जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया है।
भारत ने वैकल्पिक स्रोतों से तेल आपूर्ति संभाली
IMF के अनुसार, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने तेल के वैकल्पिक स्रोतों की मदद से आपूर्ति को संभाला। रिपोर्ट में कहा गया है कि जून से इन देशों में तेल का कुल प्रवाह संघर्ष से पहले के स्तर पर लौट आया था।
इससे भारत को आपूर्ति में आई रुकावटों का सामना करने में मदद मिली। फिर भी, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद महंगे बने रहते हैं, तो भारत की लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
महंगा तेल कैसे बढ़ा सकता है महंगाई?
तेल की कीमतें बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, माल ढुलाई, खेती, विनिर्माण और कई सेवाओं की लागत भी ऊर्जा कीमतों से प्रभावित होती है। कंपनियों की लागत बढ़ने पर कुछ उत्पादों और सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
IMF ने यह भी रेखांकित किया है कि संघर्ष के बाद डीजल और विमानन ईंधन जैसे रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कच्चे तेल की तुलना में अधिक तेज वृद्धि देखी गई। इससे एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स और अन्य ईंधन-निर्भर कारोबारों की परिचालन लागत बढ़ सकती है।
आर्थिक विकास और रुपये पर भी पड़ सकता है असर
लंबे समय तक महंगी ऊर्जा भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती है। इससे देश के चालू खाते के संतुलन पर दबाव पड़ने और रुपये की विनिमय दर प्रभावित होने का जोखिम भी हो सकता है। यदि महंगाई बढ़ती है, तो परिवारों की खरीदारी की क्षमता और कंपनियों की लागत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक जारी रहता है, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति कितनी जल्दी सामान्य होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें किस स्तर पर बनी रहती हैं।
आम लोगों को राहत देने के लिए IMF की सलाह
IMF ने कमजोर और कम आय वाले परिवारों को राहत देने के लिए लक्षित और सीमित अवधि वाले सहायता उपायों पर जोर दिया है। इसके साथ ही, व्यापक ईंधन सब्सिडी और कीमतों पर लंबे समय तक नियंत्रण जैसे उपायों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है, क्योंकि इनसे सरकारी वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखते हुए महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखे और आर्थिक विकास की रफ्तार को भी सहारा दे।
आगे क्या रहेगा अहम?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेल के स्रोतों में विविधता, वैकल्पिक ऊर्जा और वैश्विक बाजार की निगरानी महत्वपूर्ण बनी रहेगी। यदि मिडिल ईस्ट में तनाव कम होता है और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होती है, तो कीमतों का दबाव घट सकता है। इसके विपरीत, संघर्ष लंबा खिंचने पर महंगाई और आर्थिक गतिविधियों के लिए जोखिम बढ़ सकते हैं।
