पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) में हाल के दिनों में जारी विरोध प्रदर्शनों और चुनावी माहौल के बीच तनाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, बुनियादी सुविधाओं और अधिकारों की मांग को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन अब हिंसा और दमन के आरोपों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गए हैं।
रावलकोट की रहने वाली एक महिला अस्मा ने दावा किया कि उनके 15 वर्षीय बेटे की प्रदर्शन के दौरान गोली लगने से मौत हो गई। उनका कहना है कि लोग केवल सस्ता आटा, किफायती बिजली और अन्य आवश्यक सुविधाओं की मांग कर रहे थे, लेकिन हालात हिंसक हो गए। इसी तरह अपने बेटे को खो चुके पूर्व सैनिक अयूब ने भी मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि उन्होंने पहले भी कठिन दौर देखे हैं, लेकिन इस तरह के हालात पहले कभी नहीं देखे।
रिपोर्टों के अनुसार, क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध, कई इलाकों में बैरिकेडिंग और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के कारण जानकारी जुटाना मुश्किल हो गया है। स्थानीय डॉक्टरों का कहना है कि हाल के सप्ताहों में गोली लगने से घायल कई युवाओं का इलाज किया गया है। हालांकि, अस्पतालों में संसाधनों की कमी और लोगों में गिरफ्तारी या अन्य कार्रवाई का डर होने से कई घायल उपचार के लिए भी नहीं पहुंच पा रहे हैं।
इस बीच भारत ने भी पीओके की स्थिति पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में वहां कराए गए चुनावों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय एक “ढोंग” करार दिया। उनका कहना है कि वास्तविक स्थिति जनता के विरोध, अशांति और कथित दमन से जुड़ी है। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान जनता की नाराजगी को दबाने के लिए बल प्रयोग, डराने-धमकाने और संचार प्रतिबंध जैसे उपाय अपना रहा है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, जून 2026 से अब तक कम से कम 90 नागरिकों की मौत हो चुकी है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले पर ध्यान देने और नागरिकों के खिलाफ कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की मांग की है। साथ ही कहा है कि दुनिया को मानवाधिकारों के मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का गंभीरता से आकलन करना चाहिए।
