Sunday, August 9, 2026
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मक्का समझौते के बाद बड़ा सवाल: भारत से टकराव हुआ तो क्या तुर्की और सऊदी पाकिस्तान के साथ आएंगे?

by Sagar Sharma
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सऊदी अरब के मक्का में शुक्रवार को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने एक अहम संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा।

इस समझौते के बाद भारत के सामने एक अहम सवाल खड़ा हुआ है। अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य तनाव बढ़ता है और भारत ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई करता है, तो क्या इस समझौते के तहत तुर्की या सऊदी अरब पाकिस्तान के समर्थन में सीधे सामने आएंगे?

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समझौते से पाकिस्तान की मौजूदा परमाणु प्रतिरोधक क्षमता में कोई सीधा बदलाव नहीं होगा। हालांकि, इससे उसे कूटनीतिक और सैन्य सहयोग का एक नया ढांचा जरूर मिल सकता है। पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और बड़ी सैन्य क्षमता है, जबकि तुर्की रक्षा उद्योग और सैन्य तकनीक के मामले में मजबूत है। सऊदी अरब के पास आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव की बड़ी ताकत है।

यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान पहले ही एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता कर चुके थे। उस समझौते में भी एक देश पर आक्रमण को दोनों के खिलाफ हमला माना गया था।

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने साफ किया है कि नया समझौता किसी विशेष देश को निशाना बनाने के लिए नहीं है। उनका कहना है कि इसका उद्देश्य सुरक्षा सहयोग, रक्षा उद्योग में साझेदारी और आतंकवाद से मुकाबले को मजबूत करना है।

फिर भी भारत के लिए यह घटनाक्रम चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की की ओर से पाकिस्तान को समर्थन मिलने की चर्चा हुई थी। ऐसे में भविष्य में भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में इस नए रक्षा ढांचे की भूमिका अहम हो सकती है।

हालांकि, समझौते का मतलब यह जरूरी नहीं कि पाकिस्तान पर भारतीय कार्रवाई होते ही सऊदी अरब और तुर्की युद्ध में उतर जाएंगे। वास्तविक प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि हमला किस परिस्थिति में हुआ, समझौते की व्याख्या कैसे की जाती है और तीनों देश राजनीतिक स्तर पर क्या फैसला लेते हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, फिलहाल इसे ‘मुस्लिम NATO’ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि मक्का समझौता तीनों देशों के बीच बढ़ते सुरक्षा सहयोग को एक औपचारिक रूप देता है और भारत-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में इसके असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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