राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता पर बड़ा सवाल, सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई
राजनीतिक दलों को मिलने वाले गुमनाम नकद चंदे को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में आज, 31 अगस्त 2026 को उस याचिका पर सुनवाई होने वाली है, जिसमें आयकर अधिनियम के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसके तहत राजनीतिक दलों को 2,000 रुपये से कम का नकद चंदा बिना दानदाता की पहचान सार्वजनिक किए स्वीकार करने की अनुमति है। मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ करेगी।
किस प्रावधान को दी गई है चुनौती?
याचिका में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13A के खंड (d) की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता खेम सिंह भाटी का तर्क है कि मौजूदा दौर में जब डिजिटल भुगतान और UPI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ चुका है, तब राजनीतिक दलों को छोटे नकद चंदे के नाम पर दानदाता की पहचान गुप्त रखने की व्यवस्था पारदर्शी चुनावी व्यवस्था के उद्देश्य से मेल नहीं खाती।
याचिका में दावा किया गया है कि राजनीतिक फंडिंग के स्रोत और दानदाताओं की जानकारी मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है। यदि किसी राजनीतिक दल को पैसा कहां से मिल रहा है, इसकी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होगी तो मतदाता चुनाव के दौरान पूरी जानकारी के आधार पर फैसला लेने से वंचित रह सकते हैं।
याचिका में क्या-क्या मांग की गई है?
खेम सिंह भाटी की याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई महत्वपूर्ण राहत मांगी गई हैं। सबसे प्रमुख मांग धारा 13A(d) को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की है। इसके अलावा चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि किसी राजनीतिक दल के पंजीकरण और चुनाव चिन्ह आवंटित करने की शर्तों में यह शामिल किया जाए कि वह किसी भी तरह का नकद चंदा स्वीकार न करे।
याचिका में राजनीतिक दलों की ओर से जमा किए जाने वाले योगदान संबंधी रिकॉर्ड की भी अधिक सख्ती से जांच करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जिन योगदानों में दानदाता का पता या PAN उपलब्ध नहीं है, उनके संबंध में भी उचित जांच और कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए।
2024 के चुनावी बॉन्ड फैसले का भी दिया गया हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक चुनावी बॉन्ड फैसले का भी हवाला दिया गया है। उस मामले में शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया था और कहा था कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों की फंडिंग से जुड़ी जानकारी पाने का अधिकार है।
इसी फैसले की पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ता का तर्क है कि राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए जरूरी है।
पहले भी केंद्र और राजनीतिक दलों से मांगा गया था जवाब
यह मामला नया नहीं है। 24 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और 12 राजनीतिक दलों से जवाब मांगा था। अब यह मामला 31 अगस्त की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
फैसले का क्या हो सकता है असर?
यदि सुप्रीम कोर्ट याचिका में उठाए गए तर्कों को स्वीकार करता है, तो राजनीतिक दलों की फंडिंग और नकद चंदे से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव की राह खुल सकती है। इसका असर सभी राजनीतिक दलों पर पड़ सकता है, क्योंकि मामला किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता से जुड़ा है।
फिलहाल सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर हैं। अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और राजनीतिक दलों को मिलने वाले छोटे नकद चंदे को लेकर मौजूदा व्यवस्था पर क्या टिप्पणी करती है, यह आगे की चुनावी और राजनीतिक फंडिंग व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
