संसद फिर बुलाने की तैयारी? परिसीमन और महिला आरक्षण पर बढ़ी सियासी हलचल, रिजिजू के बयान से बढ़ा सस्पेंस
नई दिल्ली: संसद के मॉनसून सत्र के समाप्त होने के बाद भी परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के हालिया बयान ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। रिजिजू ने संसद की दोबारा बैठक बुलाए जाने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। उनके बयान के बाद विपक्ष ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने और परिसीमन के प्रस्ताव पर सर्वदलीय चर्चा कराने की मांग तेज कर दी है।
रिजिजू ने क्या कहा?
एक टीवी इंटरव्यू में किरेन रिजिजू से पूछा गया कि क्या सरकार संसद की एक और बैठक या विशेष सत्र बुला सकती है। उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि मॉनसून सत्र को अभी औपचारिक रूप से स्थगित नहीं किया गया है और ऐसी स्थिति में संसद को दोबारा बुलाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में कई मौकों पर ऐसा हुआ है, जब सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद उसी सत्र में संसद की दोबारा बैठक हुई।
हालांकि रिजिजू ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार वास्तव में विशेष सत्र बुलाने जा रही है। जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या विशेष सत्र की संभावना है, तो उन्होंने कोई निश्चित घोषणा नहीं की। यही वजह है कि उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं।
परिसीमन बिल पर क्यों टिकी हैं निगाहें?
परिसीमन का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध भविष्य में लोकसभा सीटों के पुनर्गठन से है। सरकार महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन से जुड़े संवैधानिक बदलावों पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है। इससे लोकसभा की सीटों की संख्या और विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव की संभावना जुड़ी हुई है।
इस मुद्दे पर पहले भी संसद में सरकार को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया था। अप्रैल 2026 में पेश किए गए संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक को लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं हुआ था। इसके बाद परिसीमन से संबंधित अन्य प्रस्तावों पर भी आगे की प्रक्रिया रुक गई थी।
विपक्ष क्यों हुआ सक्रिय?
रिजिजू के संकेत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की। खरगे ने कहा कि राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों को प्रस्तावों का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने परिसीमन के मौजूदा प्रस्तावों को लेकर अपनी प्राथमिकताएं भी सामने रखी हैं। खरगे के मुताबिक पार्टी चाहती है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक बरकरार रहे और राज्यों के बीच मौजूदा सीट वितरण भी इसी अवधि में बना रहे। साथ ही कांग्रेस 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने के पक्ष में है।
सरकार के सामने चुनौती
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जुटाना है। संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। ऐसे में विपक्षी दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार पहले ही अलग-अलग विपक्षी नेताओं से बातचीत के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर चुकी है, लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर व्यापक सहमति नहीं बन पाई है।
फिलहाल विशेष सत्र की कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि संसद को वास्तव में दोबारा बुलाया जाएगा। लेकिन रिजिजू के बयान ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि सरकार के पास आगे की संसदीय कार्रवाई के विकल्प खुले हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर अगला कदम कब और किस तरीके से उठाती है।
