संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम दौर में नीट प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सत्र खत्म होने से ठीक एक दिन पहले इस मुद्दे पर संसद में विस्तार से चर्चा के लिए अपनी सहमति जताई। उन्होंने कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है और वह हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं। हालांकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय अब गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है।
अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विपक्ष से विचार-विमर्श के बाद चर्चा कराने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वह दोपहर तीन बजे से अगले दिन दोपहर तीन बजे तक सदन में मौजूद रहकर सभी पक्षों को सुनने और सवालों के जवाब देने के लिए तैयार हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कहा कि सरकार जरूरत पड़ने पर चर्चा के लिए निर्धारित समय बढ़ाने को तैयार है।
तीन हफ्ते बाद क्यों बोले अमित शाह?
अमित शाह का यह बयान ऐसे समय आया जब मॉनसून सत्र लगभग समाप्त होने वाला था। प्रदर्शन शुरू होने के बाद विपक्ष लगातार गृह मंत्री से संसद में बयान देने और पुलिस कार्रवाई पर चर्चा की मांग करता रहा था। विपक्ष का आरोप था कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस ने कथित तौर पर अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया।
इसी वजह से राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सवाल उठ रहा है कि अगर सरकार चर्चा के लिए तैयार थी तो यह प्रस्ताव सत्र की शुरुआत में ही क्यों नहीं रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के मुताबिक, लंबे आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर भी राजनीतिक असर पड़ा और अमित शाह की ओर से आखिरी समय में चर्चा की पेशकश सरकार की स्थिति को संभालने की कोशिश हो सकती है।
कांग्रेस ने क्यों बदली रणनीति?
कांग्रेस की शुरुआती मांग थी कि अमित शाह संसद में बयान दें और प्रदर्शनकारियों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर जवाब दें। लेकिन जब गृह मंत्री ने सत्र के अंतिम चरण में चर्चा की पेशकश की, तब तक विपक्ष ने अपना रुख बदल लिया। कांग्रेस अब केवल बयान या चर्चा की मांग करने के बजाय गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रही है
राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा के अनुसार, राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से विपक्ष का अपनी रणनीति बदलना स्वाभाविक है। उनका मानना है कि अमित शाह की ओर से आखिरी वक्त में चर्चा की पेशकश सरकार के लिए सत्र का अंत सकारात्मक तरीके से करने की कोशिश हो सकती है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमित शाह के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि युवाओं को भाषण नहीं, बल्कि सीधे सवालों के जवाब चाहिए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग को लेकर पूछा कि पुलिस कार्रवाई का आदेश किसने दिया था और जिम्मेदारी किसकी थी।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि गृह मंत्री पिछले कई दिनों से इस मुद्दे पर संसद में सामने नहीं आए। उन्होंने कहा कि अगर अमित शाह ने कार्रवाई का आदेश दिया था तो उन्हें जिम्मेदारी लेनी चाहिए और अगर आदेश नहीं दिया था तो प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए।
वहीं अमित शाह ने विपक्ष पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि संसदीय प्रक्रिया के अनुसार पहले चर्चा होती है और उसके बाद सरकार जवाब देती है। उन्होंने जनता से यह तय करने की अपील की कि आखिर इस मुद्दे पर कौन चर्चा से भाग रहा है।
इस पूरे विवाद के बीच संसद का मॉनसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता नजर आया। अब सियासी लड़ाई सिर्फ प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि गृह मंत्री की जवाबदेही और उनके इस्तीफे की मांग तक पहुंच गई है। ऐसे में अमित शाह की आखिरी समय में की गई चर्चा की पेशकश और कांग्रेस का बदला हुआ रुख आने वाले दिनों में इस मुद्दे की राजनीतिक दिशा तय कर सकता है।
