सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक, भ्रामक और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा माने जाने वाले कंटेंट को लेकर सरकार की सख्ती लगातार बढ़ रही है। हाल के सरकारी आंकड़ों में बड़ी संख्या में URL और ऑनलाइन सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने के लिए कार्रवाई की मांग सामने आई है। करीब 2.98 लाख URL को हटाने की मांग और इनमें लगभग 82 फीसदी मामलों का राज्यों से सामने आना इस बात का संकेत है कि इंटरनेट पर कंटेंट मॉडरेशन अब केवल केंद्र सरकार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि राज्य स्तर पर भी इसकी निगरानी तेज हुई है।
आखिर क्यों बढ़ी URL हटाने की कार्रवाई?
सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट, वीडियो, अकाउंट या वेबपेज को हटाने की मांग कई कारणों से की जा सकती है। इनमें फर्जी खबरें, अफवाहें, आपत्तिजनक सामग्री, साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली पोस्ट, अश्लील या गैरकानूनी सामग्री, साइबर अपराध से जुड़ी जानकारी और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला कंटेंट शामिल हो सकता है।
कई बार किसी संवेदनशील घटना के बाद सोशल मीडिया पर पुराने वीडियो या तस्वीरों को नए घटनाक्रम से जोड़कर वायरल किया जाता है। इससे लोगों के बीच भ्रम और तनाव पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में पुलिस और प्रशासन संबंधित प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने की मांग कर सकते हैं।
82 फीसदी मामले राज्यों से क्यों?
इस आंकड़े का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बड़ी हिस्सेदारी राज्यों से आने वाले मामलों की बताई जा रही है। इसका कारण यह है कि सोशल मीडिया पर होने वाली कई घटनाओं का सीधा संबंध स्थानीय कानून-व्यवस्था से होता है।
किसी जिले में सांप्रदायिक तनाव, हिंसा, अफवाह, स्थानीय अपराध या संवेदनशील घटना से जुड़ा कंटेंट सबसे पहले स्थानीय पुलिस और प्रशासन के संज्ञान में आता है। इसलिए राज्य सरकारों की एजेंसियां संबंधित URL की पहचान कर कार्रवाई की मांग आगे बढ़ाती हैं।
केंद्र और राज्यों की भूमिका
भारत में ऑनलाइन कंटेंट को हटाने या ब्लॉक करने की प्रक्रिया अलग-अलग कानूनी प्रावधानों और सरकारी आदेशों के तहत हो सकती है। सूचना प्रौद्योगिकी कानून और उससे जुड़े नियमों के तहत सरकार कुछ परिस्थितियों में ऑनलाइन सामग्री पर कार्रवाई का निर्देश दे सकती है। प्लेटफॉर्म को ऐसे आदेश मिलने पर संबंधित सामग्री की समीक्षा कर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई करनी होती है।
हालांकि, हर URL को हटाने की मांग का मतलब यह नहीं है कि हर सामग्री को अंतिम रूप से गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है। कई मामलों में पहले शिकायत, जांच और कानूनी प्रक्रिया होती है।
इतनी बड़ी कार्रवाई का असर क्या होगा?
सरकार के नजरिए से ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य इंटरनेट को सुरक्षित बनाना, अफवाहों पर रोक लगाना और साइबर अपराध तथा सामाजिक तनाव को नियंत्रित करना है। खासकर ऐसे समय में जब किसी घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, प्रशासन के लिए तेज कार्रवाई महत्वपूर्ण हो जाती है।
दूसरी तरफ, इतनी बड़ी संख्या में URL हटाने की मांग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऑनलाइन सेंसरशिप को लेकर सवाल भी उठ सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि कार्रवाई स्पष्ट कानूनी आधार, पारदर्शी प्रक्रिया और उचित समीक्षा के साथ हो।
सोशल मीडिया कंपनियों की बढ़ती जिम्मेदारी
आज Meta, Google और अन्य बड़े प्लेटफॉर्म करोड़ों भारतीय यूजर्स की सामग्री होस्ट करते हैं। ऐसे में सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण हो गया है।
कुल मिलाकर, करीब 2.98 लाख URL पर कार्रवाई की मांग और राज्यों की बड़ी हिस्सेदारी यह दिखाती है कि भारत में डिजिटल कंटेंट की निगरानी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। आने वाले समय में सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि ऑनलाइन अपराध और भ्रामक सामग्री पर प्रभावी रोक लगाने के साथ-साथ नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार और पारदर्शिता का भी संतुलन बनाए रखा जाए।
