पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी आई है और ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम की अवधि खत्म होने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है. इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा को लेकर चिंता ने तेल की सप्लाई पर खतरा बढ़ा दिया है. इसका सीधा असर भारत के आयात बिल, ईंधन कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है.
कच्चे तेल के दाम फिर क्यों बढ़े?
ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड वायदा 7 सेंट की मामूली बढ़त के साथ 90.94 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया. इसी तरह अमेरिकी WTI क्रूड 53 सेंट यानी 0.63 फीसदी चढ़कर 85.03 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. दोनों प्रमुख क्रूड बेंचमार्क अपने हाल के ऊंचे स्तरों के आसपास कारोबार कर रहे हैं.
तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है. अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम की अवधि 17 अगस्त को खत्म हो गई. इससे दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीदों को झटका लगा है.
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी चिंता
दरअसल, जून में अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता हुआ था. इसके तहत दोनों देशों को करीब 60 दिनों का समय मिला था, ताकि बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकाला जा सके. हालांकि, यह समयसीमा किसी नई डील के बिना खत्म हो गई.
इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच स्थिति फिर तनावपूर्ण हो गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने से इनकार किया है. ईरान का रुख भी पहले की तुलना में ज्यादा सख्त बताया जा रहा है. बाजार में इस स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है.
होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ा जोखिम
तेल बाजार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण है. दुनिया के तेल कारोबार का बड़ा हिस्सा इस समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. यहां किसी भी तरह की सुरक्षा समस्या या आवाजाही में बाधा आने पर वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका रहती है.
विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज में सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने तेल की कीमतों को सहारा दिया है. अगर तनाव आगे बढ़ता है तो कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है.
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है. इससे डॉलर की मांग और भुगतान का दबाव बढ़ सकता है.
महंगे कच्चे तेल का असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों के अलावा परिवहन और माल ढुलाई की लागत पर भी पड़ सकता है. ट्रांसपोर्ट महंगा होने पर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचने पर भारतीय उपभोक्ताओं के बजट पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है.
