मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव जारी है और सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता ने बाजार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में WTI क्रूड करीब 83-84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि ब्रेंट क्रूड करीब 90 डॉलर के स्तर पर है। घरेलू बाजार में भी कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है।
MCX पर क्रूड करीब 2.86 फीसदी यानी 223 रुपये की बढ़त के साथ 8,029 रुपये प्रति बैरल तक पहुंच गया। ऐसे में निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या आने वाले महीनों में कच्चा तेल और महंगा हो सकता है।
तीन कारणों से बढ़ रही क्रूड में हलचल
इंटेलिसिस वेंचर्स के फाउंडर और सेबी रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट अमित सुरेश जैन के मुताबिक, मौजूदा अस्थिरता के पीछे मुख्य रूप से तीन वजहें हैं—भू-राजनीतिक तनाव, OPEC+ के सप्लाई फैसले और वैश्विक मांग।
इनमें फिलहाल सबसे बड़ा फैक्टर मिडिल ईस्ट का तनाव है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद रहने से दुनिया की ऑयल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है। जब तक अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौता नहीं होता और हॉर्मुज दोबारा नहीं खुलता, तब तक क्रूड में तेज उतार-चढ़ाव बने रहने की आशंका है।
$130 तक जा सकता है WTI
अमित सुरेश जैन के मुताबिक, अगले 3 से 6 महीनों में WTI क्रूड 130 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है। घरेलू बाजार में क्रूड के 8,400 और 8,800 रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। अगर WTI 130 डॉलर तक पहुंचता है तो भारतीय बाजार में इसकी कीमत करीब 13,000 रुपये प्रति बैरल तक जा सकती है।
हालांकि, इसके लिए 7,300 रुपये का स्तर अहम है। अगर क्रूड इस स्तर से नीचे टिकता है तो तेजी का अनुमान कमजोर पड़ सकता है।
गिरावट में $66 और $50 अहम स्तर
एक्सपर्ट के अनुसार, WTI में 73 डॉलर के आसपास सपोर्ट है, जबकि 66 डॉलर अगला महत्वपूर्ण स्तर है। अगर 66 डॉलर के नीचे मजबूत गिरावट आती है तो क्रूड 50 डॉलर से नीचे भी जा सकता है।
फिलहाल भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई बाधाओं और उत्पादन प्रतिबंधों को देखते हुए क्रूड पर बहुत ज्यादा मंदी का नजरिया रखना मुश्किल है।
भारत में पेट्रोल-डीजल पर पड़ सकता है असर
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड लगातार महंगा रहता है तो इसका असर भारत के लिए इंपोर्ट बिल और ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें केवल क्रूड के आधार पर तय नहीं होतीं; टैक्स, रुपये की कीमत और अन्य लागत भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।
आने वाले महीनों में अमेरिका-ईरान संबंध और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की स्थिति क्रूड के लिए सबसे बड़े ट्रिगर बने रह सकते हैं।
