नेपाल के रास्ते चीन से आने वाले अखरोट की कथित तस्करी ने जम्मू-कश्मीर के अखरोट कारोबारियों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सस्ते विदेशी अखरोट की बढ़ती उपलब्धता से स्थानीय उत्पादकों को कीमत और बाजार दोनों स्तरों पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
सीमा पार से आ रही सस्ती खेप
भारत-नेपाल सीमा से विदेशी अखरोट की तस्करी का मामला सामने आया है। जुलाई 2026 में उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने नेपाल से तस्करी कर भारत लाया जा रहा 330 किलोग्राम चीनी अखरोट बरामद किया था। 33 बोरियों में रखे इस अखरोट को सीमा शुल्क विभाग को सौंप दिया गया। कार्रवाई के दौरान तस्कर सामान छोड़कर नेपाल की ओर भाग गए।
यह घटना इस बात का संकेत देती है कि नेपाल के रास्ते चीनी अखरोट भारतीय बाजार तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। यदि ऐसी अवैध आपूर्ति बड़े स्तर पर जारी रहती है, तो इसका असर घरेलू अखरोट कारोबार के साथ-साथ सरकारी राजस्व पर भी पड़ सकता है।
कश्मीरी अखरोट पर दोहरी मार
जम्मू-कश्मीर देश में अखरोट उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। भारतीय कृषि निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के अनुसार, देश में अखरोट की खेती और उत्पादन में जम्मू-कश्मीर की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल अखरोट उत्पादन करीब 3.22 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया।
ऐसे में सस्ते चीनी अखरोट की बाजार में मौजूदगी स्थानीय किसानों और कारोबारियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। पिछले कुछ वर्षों से ही कश्मीरी अखरोट उद्योग विदेशी आयात के दबाव से जूझ रहा है। 2025 की रिपोर्टों में भी चीनी अखरोट की कम कीमतों को कश्मीरी उत्पादकों के लिए गंभीर चुनौती बताया गया था।
कीमत में बड़ा अंतर
बाजार में कीमत का अंतर स्थानीय उत्पादों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन रहा है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, कश्मीरी अखरोट की कीमत लगभग 700-800 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताई गई, जबकि चीनी अखरोट करीब 350-400 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर उपलब्ध था। इतना बड़ा अंतर होने पर व्यापारी और ग्राहक स्वाभाविक रूप से सस्ते विकल्प की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
हालांकि, वैध आयात और तस्करी को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। वैध आयात पर निर्धारित सीमा शुल्क और अन्य नियम लागू होते हैं, जबकि तस्करी के जरिए आने वाला माल इन प्रक्रियाओं को दरकिनार कर बाजार में पहुंच सकता है।
सरकार को राजस्व का नुकसान
तस्करी का एक बड़ा नुकसान सरकारी खजाने को होता है। जो माल वैध तरीके से सीमा पार करके भारतीय बाजार में आता है, उस पर लागू सीमा शुल्क और अन्य करों की व्यवस्था होती है। लेकिन यदि सामान चोरी-छिपे सीमा पार कराया जाता है, तो सरकार को संभावित राजस्व से वंचित होना पड़ता है।
इसके अलावा अवैध कारोबार वैध आयातकों और स्थानीय उत्पादकों के लिए भी असमान प्रतिस्पर्धा पैदा करता है। वैध कारोबारी नियमों, टैक्स और परिवहन लागत का पालन करते हैं, जबकि तस्करी के नेटवर्क से आने वाला माल कम लागत पर बाजार में उतारा जा सकता है।
किसानों और कारोबारियों की मांग
जम्मू-कश्मीर के अखरोट उद्योग से जुड़े लोगों के लिए अब चुनौती केवल विदेशी आयात नहीं, बल्कि अवैध और अनियंत्रित आपूर्ति भी बन सकती है। कारोबारी चाहते हैं कि नेपाल सीमा पर निगरानी मजबूत की जाए और बाजार में आने वाले विदेशी अखरोट के स्रोत तथा दस्तावेजों की जांच प्रभावी तरीके से हो।
कश्मीरी अखरोट की पहचान उसकी गुणवत्ता और स्वाद के कारण लंबे समय से बनी हुई है। केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने अब चुनौती यह है कि वैध व्यापार को नुकसान पहुंचाए बिना तस्करी पर प्रभावी रोक लगाई जाए। नेपाल सीमा पर हुई 330 किलोग्राम की जब्ती इसी दिशा में निगरानी की जरूरत को रेखांकित करती है।
निष्कर्ष
नेपाल के रास्ते चीनी अखरोट की तस्करी का मुद्दा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध किसानों की आय, व्यापारियों के कारोबार, बाजार में प्रतिस्पर्धा और सरकारी राजस्व से है। यदि सस्ते अवैध अखरोट की आपूर्ति बढ़ती है, तो पहले से दबाव झेल रहे कश्मीरी अखरोट उद्योग की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। इसलिए सीमा पर सख्त निगरानी और बाजार में वैध आपूर्ति की पारदर्शी व्यवस्था दोनों जरूरी हैं।
