Thursday, October 8, 2026
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छठ महापर्व से पहले फिर छाया अनुराधा पौडवाल का भक्ति गीत, सुनते ही याद आएगी छठी मैया की पूजा

by Sagar Sharma
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छठ महापर्व में अभी समय है, लेकिन भोजपुरी और छठ गीतों की गूंज धीरे-धीरे सुनाई देने लगी है। अनुराधा पौडवाल की आवाज में गाया गया लोकप्रिय छठ गीत एक बार फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। पारंपरिक धुन और छठी मैया की भक्ति से जुड़े बोल इस गीत को पर्व के माहौल से जोड़ते हैं।

पुराने छठ गीत की फिर बढ़ी लोकप्रियता

अनुराधा पौडवाल की आवाज में गाया गया ‘मारबो रे सुगवा धनुख से’ लंबे समय से छठ पूजा के लोकप्रिय गीतों में शामिल रहा है। गीत में छठ पर्व से जुड़ी लोक परंपराओं और प्रसाद की पवित्रता का वर्णन किया गया है।

पुराने होने के बावजूद इस गीत की लोकप्रियता समय के साथ कम नहीं हुई। छठ पूजा के दौरान घरों, बाजारों और पूजा स्थलों पर ऐसे पारंपरिक गीत सुनाई देना आम बात है।

गीत में झलकती है छठ की लोक परंपरा

छठ पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि लोक संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा पर्व है। गीतों में व्रत, प्रसाद, घाट और सूर्यदेव की आराधना से जुड़ी परंपराओं का वर्णन मिलता है।अनुराधा पौडवाल की आवाज में गाए गए छठ गीतों में भी इसी लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है। सरल शब्दों और पारंपरिक संगीत के कारण ये गीत लोगों को आसानी से जुड़ाव महसूस कराते हैं।

सूर्यदेव और छठी मैया की आराधना

छठ महापर्व में सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा का विशेष महत्व है। व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

इसी आस्था को छठ गीतों के माध्यम से भी व्यक्त किया जाता है। ‘उग हो सूरज देव’ और ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ जैसे पारंपरिक गीत भी छठ पूजा के दौरान काफी सुने जाते हैं।

बिहार से लेकर देश के कई हिस्सों तक पहुंचा पर्व

छठ पूजा की परंपरा का विशेष संबंध बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से रहा है। हालांकि अब देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग भी बड़े स्तर पर इस पर्व को मनाते हैं।

छठ गीतों ने इस सांस्कृतिक परंपरा को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। घरों में पूजा की तैयारियों से लेकर छठ घाट तक इन गीतों की मौजूदगी पर्व के माहौल को भक्तिमय बनाती है।

डिजिटल दौर में पुराने गीतों को नई पहचान

आज सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म की वजह से पुराने भक्ति गीत नई पीढ़ी तक भी पहुंच रहे हैं। छठ के मौसम में पुराने गीतों को दोबारा सुनने और साझा करने का चलन बढ़ जाता है।

अनुराधा पौडवाल के छठ गीत भी इसी वजह से हर साल दोबारा लोगों की प्लेलिस्ट में जगह बनाते हैं। पारंपरिक संगीत और परिचित आवाज लोगों को पुराने छठ पर्व की यादों से जोड़ती है।

अनुराधा पौडवाल की आवाज की अलग पहचान

अनुराधा पौडवाल ने फिल्मी संगीत के साथ भक्ति संगीत में भी लंबा योगदान दिया है। उनके भजनों और धार्मिक गीतों को लंबे समय से श्रोता पसंद करते रहे हैं।छठ गीतों में उनकी आवाज का इस्तेमाल पारंपरिक लोकधुनों के साथ किया गया है। यही वजह है कि इन गीतों की पहचान केवल एक समय या पीढ़ी तक सीमित नहीं रही।

महापर्व से पहले ही बनने लगा भक्ति का माहौल

छठ पूजा जैसे-जैसे करीब आती है, इससे जुड़े गीतों की लोकप्रियता भी बढ़ती दिखाई देती है। पारंपरिक छठ गीत लोगों को पूजा की तैयारियों, घाट और परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय की याद दिलाते हैं।

अनुराधा पौडवाल की आवाज में गाए गीतों का दोबारा चर्चा में आना इसी सांस्कृतिक जुड़ाव को दिखाता है। छठ महापर्व से पहले ऐसे गीतों की गूंज लोगों के बीच भक्ति और लोक परंपरा का माहौल तैयार करती है।

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