Saturday, September 12, 2026
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अखिलेश के ‘चवन्नी’ तंज पर जयंत का पलटवार, 2027 से पहले पश्चिमी यूपी में गरमाई सियासत

by Sagar Sharma
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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पश्चिमी यूपी की सियासत में बयानबाजी तेज हो गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ वाले तंज पर RLD प्रमुख जयंत चौधरी ने पलटवार किया है। जयंत ने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही तय करती है कि कौन चवन्नी है और कौन रुपया। इस विवाद ने सपा और RLD के पुराने रिश्तों के साथ-साथ पश्चिमी यूपी की जाट राजनीति को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दोनों नेताओं की इस जुबानी जंग को 2027 के चुनावी समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।

चवन्नी वाले बयान से शुरू हुआ विवाद

अखिलेश यादव ने हाल में गठबंधन के पुराने सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि उन्होंने चवन्नी को रुपया बना दिया, फिर भी कुछ लोग उन्हें छोड़कर चले गए। उनके इस बयान को जयंत चौधरी और RLD से जोड़कर देखा गया। इसके बाद RLD नेताओं और समर्थकों की ओर से नाराजगी सामने आई।

जयंत चौधरी ने जवाब देते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर होती है। वही तय करती है कि कौन चवन्नी है और कौन रुपया। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक अहंकार आखिरकार पतन की वजह बनता है। जयंत ने समाज के खिलाफ टिप्पणी को भी गलत बताया और कहा कि राजनीतिक विरोध को पूरे समाज के विरोध में नहीं बदलना चाहिए।

जाट राजनीति के लिहाज से अहम विवाद

पश्चिमी यूपी में RLD की राजनीति लंबे समय से जाट और किसान वर्ग के इर्द-गिर्द रही है। चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत से जुड़ी पार्टी होने के कारण जयंत चौधरी का इस क्षेत्र में अलग प्रभाव माना जाता है। ऐसे में अखिलेश के बयान को RLD जाट सम्मान से जोड़कर देख रही है।

हालांकि, अभी यह कहना मुश्किल है कि इस बयान का पूरे जाट समाज पर एक जैसा असर पड़ेगा। लेकिन इतना जरूर है कि RLD इस मुद्दे को सियासी तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकती है। दूसरी ओर, सपा भी पश्चिमी यूपी में अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

कभी साथ थे अखिलेश और जयंत

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और RLD ने मिलकर चुनाव लड़ा था। दोनों दलों ने पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम समीकरण को मजबूत करने की कोशिश की थी। उस समय अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की जोड़ी को इस क्षेत्र में काफी अहम माना गया था।

बाद में दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। जयंत चौधरी एनडीए के साथ चले गए और केंद्र सरकार में मंत्री बने। वहीं अखिलेश यादव पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर आगे बढ़े।

2027 में किसके साथ जाएगा जाट वोट?

पश्चिमी यूपी में जाट वोट कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। जाटों के अलावा मुस्लिम, गुर्जर, दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का समीकरण भी अहम भूमिका निभाता है।

ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले अखिलेश और जयंत के बीच बढ़ती तल्खी को सिर्फ व्यक्तिगत विवाद मानना आसान नहीं होगा। RLD अपने पारंपरिक जाट-किसान आधार को मजबूत रखना चाहेगी, जबकि सपा नए सामाजिक समीकरणों के जरिए पश्चिमी यूपी में अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश करेगी।

फिलहाल ‘चवन्नी’ विवाद ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि 2027 की चुनावी लड़ाई में पश्चिमी उत्तर प्रदेश एक बार फिर बड़ा सियासी मैदान बनने जा रहा है।

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