अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे और दान में कथित अनियमितताओं को लेकर विवाद अब मंदिर निर्माण और प्रशासनिक व्यवस्था में जिम्मेदारी तय करने तक पहुंचता दिख रहा है। पूर्व ट्रस्ट महासचिव चंपत राय की बताई जा रही एक गोपनीय डायरी में राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा की भूमिका और उनके सार्वजनिक बयानों को लेकर कई सवाल दर्ज होने की बात सामने आई है। हालांकि, इन आरोपों और दावों को लेकर संबंधित पक्षों के अपने-अपने बयान हैं और इन्हें अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
संतों के सवाल से सामने आया विवाद का नया पहलू
रिपोर्ट के अनुसार, चंपत राय की डायरी में लिखा है कि चढ़ावा चोरी प्रकरण के कुछ दिनों बाद कुछ संतों ने उनसे सवाल किया था कि क्या नृपेंद्र मिश्रा इस पूरे घटनाक्रम में ‘खलनायक’ की भूमिका निभा रहे हैं। डायरी के मुताबिक, चंपत राय ने उस समय इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया था। यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पता चलता है कि विवाद के दौरान मंदिर से जुड़े लोगों के बीच भी जिम्मेदारी और भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे थे।
चार दिनों में 14 टीवी इंटरव्यू का भी जिक्र
डायरी में 18 जून से शुरू हुए नृपेंद्र मिश्रा के टेलीविजन साक्षात्कारों का भी उल्लेख बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने चार दिनों के भीतर करीब 14 टीवी चैनलों से बातचीत की थी। शुरुआत में मिश्रा की ओर से यह कहा जाता था कि उनकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से मंदिर के निर्माण कार्य तक सीमित है। बाद के बयानों में चढ़ावे से जुड़ी चोरी के लिए अधिक कठोर शब्दों के इस्तेमाल का जिक्र भी डायरी में किया गया है।
चंपत राय ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि इतने कम समय में इतनी संख्या में चैनलों को इंटरव्यू देने की जरूरत क्यों पड़ी और इसके पीछे किसकी प्रेरणा थी। डायरी में यह भी लिखा बताया गया है कि 23 जून के बाद नृपेंद्र मिश्रा के सार्वजनिक बयान अचानक बंद हो गए और इसके कारण को लेकर भी सवाल उठाए गए।
मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर भी उठे सवाल
विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू निर्माण समिति और मंदिर की अन्य व्यवस्थाओं के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। रिपोर्ट में चंपत राय की डायरी के हवाले से कहा गया है कि नृपेंद्र मिश्रा पिछले वर्षों में नियमित रूप से निर्माण समिति की बैठकों के लिए अयोध्या आते रहे। लेकिन मंदिर की अन्य व्यवस्थाओं और हिसाब-किताब से जुड़े विषयों पर सामूहिक चर्चा कितनी हुई, इसे लेकर सवाल दर्ज किए गए हैं।
डायरी में यह दावा भी बताया गया है कि कई मुद्दों पर फोन के माध्यम से निर्देश दिए जाते थे, लेकिन उनके बारे में लंबी सामूहिक चर्चा नहीं होती थी। यदि इन दावों की पुष्टि होती है तो मंदिर प्रशासन में निर्णय लेने की प्रक्रिया और विभिन्न पदों की जिम्मेदारियों को लेकर विस्तृत स्पष्टीकरण की जरूरत होगी।
नृपेंद्र मिश्रा ने आरोपों को बताया अफवाह
दूसरी ओर नृपेंद्र मिश्रा ने चंपत राय से जुड़े पत्र और उससे निकल रही खबरों को लेकर अलग रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कथित पत्र देखा ही नहीं और विवाद पैदा करने के उद्देश्य से अफवाहें फैलाई जा रही हैं। मिश्रा ने यह भी कहा कि राम मंदिर निर्माण में केंद्र या उत्तर प्रदेश सरकार का पैसा खर्च नहीं हुआ और परियोजना ट्रस्ट के संसाधनों से आगे बढ़ी। उनके अनुसार निर्माण परियोजना के 70 महत्वपूर्ण कार्यों में से 60 पूरे हो चुके हैं।
जवाबदेही को लेकर बढ़ी चर्चा
इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल यही है कि राम मंदिर निर्माण, चढ़ावे, प्रशासन और वित्तीय व्यवस्थाओं में किस पद की क्या जिम्मेदारी थी। चंपत राय से जुड़ी कथित डायरी में उठाए गए सवाल और नृपेंद्र मिश्रा का जवाब सामने आने के बाद सार्वजनिक चर्चा और तेज हो गई है। वहीं, कथित पत्र की प्रामाणिकता को लेकर भी सवाल मौजूद हैं; कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि सोशल मीडिया पर वायरल पत्र पर चंपत राय के हस्ताक्षर नहीं हैं।
फिलहाल इस मामले में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले आधिकारिक जांच, दस्तावेजों और संबंधित संस्थाओं के स्पष्ट बयानों का इंतजार करना जरूरी है। राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है, इसलिए चढ़ावे और निर्माण से संबंधित किसी भी वित्तीय या प्रशासनिक विवाद में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण होगी।
