दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय सहयोग और कूटनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने पाकिस्तान की धरती से दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) को सक्रिय करने और इसके शिखर सम्मेलन के आयोजन की मांग उठाई है। उनकी इस पहल को क्षेत्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप और दक्षिण एशियाई देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि मुइज्जू अपने राजनीतिक रुख के कारण पहले भी भारत-मालदीव संबंधों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं।
पाकिस्तान से SAARC को दोबारा सक्रिय करने की अपील
SAARC दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित एक क्षेत्रीय संगठन है। इसकी स्थापना 1985 में हुई थी। भारत, पाकिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और अफगानिस्तान इसके सदस्य हैं। संगठन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में विकास, गरीबी उन्मूलन, व्यापार और आपसी सहयोग को प्रोत्साहित करना है।
हालांकि, बीते वर्षों में भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंधों का असर संगठन की गतिविधियों पर पड़ा है। वर्ष 2014 में काठमांडू में आयोजित शिखर सम्मेलन के बाद SAARC का कोई नया शिखर सम्मेलन नहीं हो सका। ऐसे में मुइज्जू की ओर से सम्मेलन आयोजित करने की मांग ने संगठन के भविष्य और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाओं पर फिर से ध्यान आकर्षित किया है।
भारत-मालदीव संबंधों के संदर्भ में क्यों अहम है यह बयान?
मोहम्मद मुइज्जू का राजनीतिक उदय मालदीव में भारत की भूमिका और वहां मौजूद भारतीय सैन्य कर्मियों की उपस्थिति से जुड़े मुद्दों के बीच हुआ था। उनके चुनाव अभियान के दौरान ‘इंडिया आउट’ का नारा काफी चर्चा में रहा। इस नारे के जरिए मालदीव की संप्रभुता और विदेशी सैन्य उपस्थिति से जुड़े सवालों को राजनीतिक बहस के केंद्र में रखा गया था।
राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू की सरकार ने भारतीय सैन्य कर्मियों की वापसी की मांग की। इसके बाद भारत और मालदीव के संबंधों में तनाव देखने को मिला। हालांकि, दोनों देशों ने बाद में उच्चस्तरीय वार्ताओं और कूटनीतिक संपर्कों के माध्यम से संबंधों को संभालने की कोशिश भी की।
इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान में SAARC शिखर सम्मेलन की मांग को क्षेत्रीय कूटनीति के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। फिर भी, केवल इस बयान के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मालदीव की विदेश नीति पूरी तरह भारत-विरोधी दिशा में जा रही है।
SAARC की राह में सबसे बड़ी चुनौती भारत-पाकिस्तान तनाव
SAARC के पुनरुद्धार की चर्चा के बावजूद संगठन के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी राजनीतिक तनाव तथा सुरक्षा संबंधी विवादों ने क्षेत्रीय सहयोग को प्रभावित किया है। दोनों देशों के संबंधों में सुधार के बिना संगठन के शीर्ष स्तर पर बैठक आयोजित करना कठिन हो सकता है।
इसके अलावा, दक्षिण एशिया के देशों की आर्थिक प्राथमिकताएं, व्यापार संबंधी बाधाएं और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। किसी शिखर सम्मेलन की मांग को वास्तविक रूप देने के लिए सदस्य देशों के बीच सहमति और ठोस कूटनीतिक प्रयास जरूरी होंगे।
क्या फिर लौटेगा दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग का दौर?
मुइज्जू की मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब दक्षिण एशियाई देशों के बीच व्यापार, संपर्क, ऊर्जा, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। SAARC को सक्रिय करने से इन क्षेत्रों में साझा पहल को गति मिल सकती है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक मतभेदों को दूर करना आवश्यक होगा।
फिलहाल, पाकिस्तान में की गई यह मांग दक्षिण एशियाई कूटनीति में एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय है। हालांकि, शिखर सम्मेलन की तारीख, सदस्य देशों की सहमति और आयोजन की औपचारिक प्रक्रिया से जुड़ी आधिकारिक जानकारी के बिना इसके आयोजन को तय मानना जल्दबाजी होगी। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सदस्य देश इस प्रस्ताव पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और क्या SAARC को दोबारा सक्रिय करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है।
