Sunday, September 13, 2026
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भारत की Gen Z के सामने रोजगार का संकट, डिग्री के बाद भी नौकरी की गारंटी नहीं

by Sagar Sharma
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के खिलाफ Gen Z का आंदोलन भले खत्म हो गया हो, लेकिन युवाओं की रोजगार और सरकारी भर्ती से जुड़ी चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं। झारखंड के रांची में सरकारी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ जारी प्रदर्शन इसी बड़ी समस्या की ओर इशारा करता है।

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है और यही युवा आबादी देश के डेमोग्राफिक डिविडेंड की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इसका फायदा तभी मिलेगा, जब युवाओं के लिए पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा हों।

100 करोड़ कामकाजी उम्र की आबादी, रोजगार सिर्फ 67 करोड़ को

15 से 64 वर्ष की आबादी को आमतौर पर कामकाजी उम्र की श्रेणी में रखा जाता है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 100 करोड़ लोग कामकाजी उम्र के हैं, लेकिन इनमें लगभग 67 करोड़ लोगों के पास ही रोजगार है।

युवाओं की बेरोजगारी भी बड़ी चिंता है। आंकड़ों के मुताबिक देश के बेरोजगारों में करीब 83 फीसदी युवा हैं। इसका सीधा असर उनकी आर्थिक स्वतंत्रता, उपभोग क्षमता और भविष्य की योजनाओं पर पड़ता है

डिग्री बढ़ी, लेकिन नौकरियां नहीं

भारत में लंबे समय से ग्रेजुएशन और प्रोफेशनल डिग्री को बेहतर करियर की सीढ़ी माना जाता रहा है। लेकिन अब बड़ी संख्या में डिग्रीधारी युवा भी नौकरी की तलाश में हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कम पढ़े-लिखे युवाओं की तुलना में ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर काफी अधिक है।

CMIE के आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में करीब 9 करोड़ ग्रेजुएट जुड़े, लेकिन इनमें से लगभग 4.9 करोड़ ही श्रम बाजार का हिस्सा बने। इनमें करीब 1.2 करोड़ बेरोजगार बताए गए हैं।

‘जॉबलेस ग्रोथ’ बनी चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन उसी अनुपात में रोजगार के अवसर नहीं बन रहे। इसे ‘जॉबलेस ग्रोथ’ की स्थिति कहा जा रहा है।

आईटी सेक्टर में AI के बढ़ते इस्तेमाल से भी पारंपरिक नौकरियों को लेकर नई चिंता पैदा हुई है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कम वेतन युवाओं के लिए आकर्षण कम कर रहा है।

अगर बड़ी युवा आबादी को रोजगार नहीं मिलता है तो उनकी आय और खर्च करने की क्षमता प्रभावित होगी। इसका असर बाजार की मांग और आर्थिक विकास पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत के सामने अब केवल ज्यादा रोजगार पैदा करने की नहीं, बल्कि अच्छी और स्थायी नौकरियां उपलब्ध कराने की चुनौती भी है।

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