पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा से सिख समुदाय की ऐतिहासिक विरासत को लेकर गंभीर खबर सामने आई है। गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा की ऐतिहासिक इमारत को कथित तौर पर गिराए जाने के बाद सिख समुदाय में नाराजगी है। स्थानीय सिख प्रतिनिधियों का आरोप है कि गुरुद्वारे की जगह अब व्यावसायिक निर्माण की तैयारी की जा रही है। इस मामले पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने भी चिंता जताई है।
करीब 200 साल पुरानी विरासत पर उठे सवाल
रिपोर्टों के मुताबिक, क्वेटा के आर्चर रोड इलाके में स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा को ऐतिहासिक सिख धार्मिक स्थल माना जाता है। हालांकि इसकी सही स्थापना वर्ष को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। कुछ स्थानीय प्रतिनिधि इसे करीब 200 साल पुराना बताते हैं, जबकि अन्य उपलब्ध जानकारी में इसके निर्माण का समय 1930 के आसपास बताया गया है। इसलिए इसकी वास्तविक ऐतिहासिक उम्र की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड से होना जरूरी है।
स्थानीय सिख समुदाय का कहना है कि यह स्थल केवल एक धार्मिक इमारत नहीं था, बल्कि क्वेटा में सिख समुदाय के लंबे इतिहास और मौजूदगी से जुड़ा हुआ था। बताया गया है कि बाद के वर्षों में परिसर में सेंट गैब्रियल स्कूल भी संचालित होता रहा।
गुरुद्वारे की जगह व्यावसायिक निर्माण का आरोप
बलूचिस्तान सिख काउंसिल से जुड़े प्रतिनिधियों के अनुसार, गुरुद्वारे और स्कूल की इमारत को करीब दो सप्ताह पहले एक निजी पक्ष ने गिरा दिया। समुदाय का दावा है कि वहां अब व्यावसायिक परियोजना विकसित करने की तैयारी है। स्थानीय सिख प्रतिनिधियों ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए मामले में कानूनी कदम उठाने की बात भी कही है।
कुछ रिपोर्टों में यह आरोप भी सामने आया है कि गुरुद्वारे से संबंधित जमीन को निजी बिल्डर को सौंपा गया। हालांकि, जमीन के स्वामित्व, हस्तांतरण और निर्माण की अनुमति से जुड़े दस्तावेजों की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना इस विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
SGPC ने बताया गंभीर मामला
SGPC अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने गुरुद्वारे को गिराए जाने की खबर पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में मौजूद ऐतिहासिक गुरुद्वारे केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं हैं, बल्कि सिख समुदाय की धार्मिक पहचान, इतिहास और विरासत के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं
धामी ने पाकिस्तान सरकार और संबंधित अधिकारियों से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने, निर्माण कार्य रोकने और गुरुद्वारे की संपत्ति को सिख समुदाय को सौंपने की मांग की है। उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय से भी इस मुद्दे को पाकिस्तान सरकार के सामने राजनयिक स्तर पर उठाने की अपील की है।
बलूचिस्तान में सिख विरासत को लेकर चिंता
स्थानीय सिख प्रतिनिधियों के अनुसार, बलूचिस्तान में कभी करीब 12 गुरुद्वारे हुआ करते थे, लेकिन अब केवल दो के बचे होने का दावा किया जा रहा है। यदि यह आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होता है, तो यह क्षेत्र में सिख धार्मिक विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सिख समुदाय का कहना है कि धार्मिक स्थलों की संख्या कम होने के बावजूद उनका ऐतिहासिक महत्व खत्म नहीं होता। ऐसे स्थान किसी क्षेत्र में समुदाय की पुरानी मौजूदगी और सांस्कृतिक इतिहास के महत्वपूर्ण प्रमाण होते हैं।
सिर्फ इमारत नहीं, इतिहास का हिस्सा
पुराने गुरुद्वारे सिख समुदाय के लिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक स्मृतियों से भी जुड़े होते हैं। विभाजन से पहले पाकिस्तान के कई हिस्सों में सिख समुदाय की बड़ी मौजूदगी थी। विभाजन के बाद आबादी में बड़ा बदलाव आया, लेकिन कई धार्मिक स्थल आज भी उस इतिहास की याद दिलाते हैं।
इसी कारण किसी ऐतिहासिक गुरुद्वारे को व्यावसायिक निर्माण के लिए हटाए जाने की खबर सिर्फ संपत्ति विवाद नहीं, बल्कि विरासत संरक्षण का विषय भी बन जाती है।
अब क्या होगा?
फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात पाकिस्तान सरकार और संबंधित संस्थाओं की आधिकारिक स्थिति होगी। जमीन के रिकॉर्ड, स्वामित्व, निर्माण की अनुमति और गुरुद्वारे की ऐतिहासिक स्थिति से जुड़े दस्तावेज सामने आने के बाद ही पूरे विवाद की तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
SGPC और स्थानीय सिख समुदाय की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि ऐतिहासिक धार्मिक स्थल को नियमों के विपरीत हटाया गया है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। साथ ही, पाकिस्तान में मौजूद अन्य ऐतिहासिक गुरुद्वारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग उठ रही है।
