सोशल मीडिया कंपनी मेटा की मुश्किलें भारत में बढ़ती दिखाई दे रही हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के निर्देशों के बाद दिल्ली पुलिस ने मेटा इंडिया के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। यह मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण और उनसे जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री की उपलब्धता से संबंधित है। इस कार्रवाई के बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा, विज्ञापनों की निगरानी और कंपनियों की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने 4 नवंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आयोग के निर्देशों पर दिल्ली पुलिस ने मेटा इंडिया द्वारा संचालित प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) की उपलब्धता के मामले में एफआईआर दर्ज की है।
क्या है पूरा मामला, जिसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई?
इस पूरे विवाद की शुरुआत इंस्टाग्राम पर कथित तौर पर दिखाए गए कुछ विज्ञापनों से हुई थी। आरोप है कि प्लेटफॉर्म पर ऐसे विज्ञापन दिखाई दिए, जिनमें आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करके लोगों को टेलीग्राम चैनलों तक पहुंचाया जा रहा था। इन चैनलों पर कथित तौर पर बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई जा रही थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसका संज्ञान लिया। आयोग ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी संवेदनशील सामग्री से जुड़े विज्ञापन मेटा की समीक्षा और निगरानी व्यवस्था से गुजरकर प्लेटफॉर्म पर कैसे दिखाई दिए।आयोग ने यह भी जानना चाहा कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित सामग्री को हटाने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए क्या कदम उठाए गए।
NHRC ने दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार से मांगा जवाब
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में केवल मेटा की भूमिका तक जांच सीमित नहीं रखी। आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से भी जवाब मांगा था।आयोग ने अधिकारियों को डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने, पीड़ित बच्चों की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा कथित रूप से जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने के निर्देश दिए थे।
इसके अलावा टेलीग्राम से संबंधित जानकारी और विज्ञापनों के पीछे मौजूद आर्थिक लेनदेन की भी जांच करने पर जोर दिया गया।
POCSO कानून के तहत कंपनियों की जिम्मेदारी पर सवाल
इस मामले में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले पॉक्सो (POCSO) कानून की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कानून की धारा 19 के तहत बच्चों के खिलाफ यौन अपराध की जानकारी होने पर संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को देना अनिवार्य है
NHRC ने यह जानना चाहा कि क्या मेटा और संबंधित अधिकारियों ने अपनी कानूनी रिपोर्टिंग जिम्मेदारियों का पालन किया था। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई पर भी जोर दिया गया।
अब मेटा के लिए आगे क्या होंगी चुनौतियां?
एफआईआर दर्ज होने के बाद दिल्ली पुलिस मामले की जांच करेगी। जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि आपत्तिजनक विज्ञापन किस तरह प्लेटफॉर्म पर पहुंचे, उनकी समीक्षा किस स्तर पर हुई और शिकायतों के बाद क्या कार्रवाई की गई।इसके साथ ही मेटा के कंटेंट मॉडरेशन, विज्ञापन जांच और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े सिस्टम की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। हालांकि, एफआईआर दर्ज होना किसी कंपनी या व्यक्ति का अपराध साबित होना नहीं है। जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही जिम्मेदारी तय होगी।
