पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हाल ही में हुआ रक्षा समझौता दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की रणनीतिक तस्वीर को बदलने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है। 7 अगस्त 2026 को मक्का में तीनों देशों ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, इसे सीधे NATO जैसी सैन्य व्यवस्था मानना अभी जल्दबाजी होगी।
इस समझौते में तुर्की की भूमिका भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। तुर्की के पास NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना है और उसका रक्षा उद्योग ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तथा अन्य सैन्य तकनीकों के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। पाकिस्तान और तुर्की के बीच पहले से ही सैन्य सहयोग मौजूद है और दोनों देश रक्षा उद्योग, प्रशिक्षण तथा रणनीतिक सहयोग को लगातार मजबूत कर रहे हैं। अप्रैल 2026 में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय सैन्य संवाद में भी रक्षा उद्योग और सैन्य सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई थी।
भारत के लिए चिंता की एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान के साथ तुर्की की नजदीकी केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के बीच सैन्य और रक्षा औद्योगिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। हाल के घटनाक्रमों में पाकिस्तान में तुर्की की संभावित सैन्य आपूर्ति और गतिविधियों को लेकर भी रिपोर्टें सामने आई हैं। हालांकि, ऐसी रिपोर्टों में बताए गए हथियारों या उपकरणों की पूरी पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है, इसलिए इनके बारे में सावधानी से निष्कर्ष निकालना जरूरी है।
अब सवाल उठता है कि अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है और तुर्की पाकिस्तान के समर्थन में आता है तो क्या NATO तुर्की की ओर से भारत के खिलाफ युद्ध में उतर जाएगा? इसका जवाब सीधा नहीं है। NATO का Article 5 सदस्य देशों की सामूहिक रक्षा से संबंधित है। इसका उद्देश्य किसी NATO सदस्य पर सशस्त्र हमला होने पर सहयोगी देशों की सहायता सुनिश्चित करना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि NATO किसी सदस्य द्वारा शुरू किए गए हर सैन्य संघर्ष में स्वतः उसके पक्ष में युद्ध करेगा। NATO के अनुसार Article 5 के तहत सहायता का स्वरूप भी परिस्थितियों और सहयोगी देशों के निर्णय पर निर्भर करता है।
यही वजह है कि तुर्की की NATO सदस्यता को भारत के खिलाफ किसी संभावित संघर्ष में स्वतः अमेरिकी या यूरोपीय सैन्य समर्थन की गारंटी के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसके अलावा, तुर्की खुद NATO और नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे दोनों के साथ आगे बढ़ने की रणनीति अपना रहा है। विशेषज्ञों ने भी मक्का समझौते को NATO का विकल्प नहीं, बल्कि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक सहयोग का नया ढांचा बताया है।
इसी बीच इजरायल और तुर्की के बीच भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। अगस्त 2026 में सीरिया में तुर्की की बढ़ती सैन्य मौजूदगी को लेकर इजरायल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और अबू दुहूर एयरबेस पर हमला किया। इजरायल का कहना था कि सीरिया में तुर्की की सैन्य मौजूदगी उसकी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकती है। तुर्की ने इस कार्रवाई की आलोचना की।
हालांकि, यह कहना कि इजरायल ने भारत को सीधे तुर्की से निपटने का ‘रास्ता’ दिखा दिया है, एक राजनीतिक या विश्लेषणात्मक व्याख्या होगी, कोई आधिकारिक भारतीय-इजरायली रणनीति नहीं। भारत और इजरायल के बीच रक्षा एवं रणनीतिक संबंध मजबूत हैं, लेकिन विदेश मंत्रालय ने हाल ही में सोशल मीडिया पर भारत-इजरायल के किसी नए रक्षा समझौते से जुड़े कुछ दावों को फर्जी बताया था।
भारत के सामने फिलहाल चुनौती यह है कि पाकिस्तान को तुर्की से मिलने वाली सैन्य तकनीक और रणनीतिक सहायता क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में नई दिल्ली के लिए अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ खाड़ी देशों, इजरायल और अन्य रणनीतिक साझेदारों के साथ संबंधों को संतुलित रखना महत्वपूर्ण होगा।
