अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो चार महीने के भीतर दूसरी बार भारत दौरे पर आ रहे हैं। इस बार उनकी यात्रा का सबसे खास पहलू यह है कि वह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के बजाय मुंबई और गुजरात के जामनगर में अपना कार्यक्रम पूरा करेंगे। 19 से 22 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित इस दौरे में भारत-अमेरिका संबंधों, ऊर्जा सहयोग, व्यापारिक निवेश और वैश्विक परिस्थितियों पर चर्चा प्रमुख रहने की उम्मीद है। इस यात्रा को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है, जब दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते, टैरिफ और रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
चार महीने में दूसरी यात्रा का मकसद क्या है?
मार्को रूबियो ने मई 2026 के अंत में भारत का दौरा किया था। अब उनकी दूसरी यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के साथ आर्थिक और ऊर्जा संबंधों को मजबूती देना है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन कई मुद्दों पर सहमति बनाना चुनौती बना हुआ है।
अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, निवेश के नए अवसर तलाशने और क्षेत्रीय एवं वैश्विक परिस्थितियों पर विचार-विमर्श करने में रुचि रखता है। ऐसे में यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके आर्थिक और रणनीतिक पहलू भी महत्वपूर्ण हैं।
दिल्ली की जगह मुंबई को क्यों चुना गया?
मुंबई देश की वित्तीय राजधानी है और यहां बड़े उद्योग समूहों, निवेशकों तथा वित्तीय संस्थानों का प्रमुख केंद्र है। इस वजह से रूबियो के दौरे में मुंबई को शामिल करना कारोबारी सहयोग को प्राथमिकता देने का संकेत माना जा रहा है।
20 अक्टूबर को रूबियो की भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक प्रस्तावित है। इसमें द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय तथा वैश्विक घटनाक्रम पर चर्चा होने की उम्मीद है। इसके अलावा, दोनों पक्ष आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के संभावित रास्तों पर भी विचार कर सकते हैं।
मुंबई में अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रम में भी रूबियो और जयशंकर की भागीदारी निर्धारित है। भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि विदेशी प्रतिनिधियों के साथ विशेष कार्यक्रमों और बैठकों का आयोजन दिल्ली से बाहर करना कोई असामान्य बात नहीं है।
जामनगर क्यों है इस दौरे का अहम पड़ाव?
गुजरात का जामनगर दुनिया के सबसे बड़े एकल-स्थल तेल रिफाइनरी परिसरों के लिए जाना जाता है। यहां रिलायंस इंडस्ट्रीज का विशाल रिफाइनिंग केंद्र स्थित है, जिसकी क्षमता अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
रूबियो के जामनगर दौरे के दौरान रिलायंस समूह के प्रतिनिधियों से मुलाकात की संभावना है। इस कार्यक्रम को भारत की तेल शोधन क्षमता और अमेरिका की ऊर्जा जरूरतों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति, कीमतों और कच्चे तेल की उपलब्धता से जुड़े सवाल लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता दोनों देशों के बीच ऊर्जा कारोबार बढ़ाने का अवसर उपलब्ध करा सकती है। हालांकि, जामनगर की यात्रा से किसी निश्चित तेल आपूर्ति समझौते या अतिरिक्त निर्यात पर सहमति बन जाने का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।
व्यापार समझौते और रूसी तेल पर भी नजर
रूबियो की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दोनों देश मतभेदों के बावजूद सहयोग के नए अवसर तलाश रहे हैं। ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक साझेदारी पर बातचीत से व्यापारिक वार्ताओं को भी दिशा मिल सकती है, हालांकि किसी अंतिम समझौते की घोषणा की पुष्टि अलग से आवश्यक होगी।
भारत और अमेरिका के संबंधों में व्यापार समझौता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। टैरिफ, बाजार तक पहुंच और विभिन्न उत्पादों के व्यापार से संबंधित सवालों पर दोनों पक्षों को आगे बढ़ना है। इसके अलावा, रूस से भारत की तेल खरीद पर अमेरिकी नीतियों और संभावित शुल्क संबंधी दबाव ने भी आर्थिक संबंधों को प्रभावित किया है।
क्या दिल्ली न जाना कूटनीतिक संदेश है?
रूबियो के दिल्ली न आने को लेकर राजनीतिक चर्चा भी हुई है। कुछ विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया कि अमेरिकी विदेश मंत्री की प्रमुख बैठकें राजधानी के बजाय मुंबई में क्यों रखी गई हैं। खास तौर पर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की उस टिप्पणी पर बहस हुई, जिसमें उन्होंने जयशंकर के मुंबई आने की उम्मीद जताई थी।
हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस व्यवस्था को सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया के दायरे में बताया है। इसलिए केवल बैठक के स्थान के आधार पर भारत-अमेरिका संबंधों में किसी बड़े बदलाव या भारत की कूटनीतिक स्थिति पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
कुल मिलाकर, मार्को रूबियो का यह दौरा ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक निवेश और रणनीतिक सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण है। मुंबई में होने वाली वार्ता और जामनगर की रिफाइनरी से जुड़ा कार्यक्रम यह संकेत देता है कि भारत-अमेरिका साझेदारी में पारंपरिक कूटनीति के साथ व्यावसायिक हितों को भी प्रमुख स्थान मिल रहा है।
