कानपुर जिले की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। जिले के 40 से अधिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं, जहां स्थायी या पूर्णकालिक डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। डॉक्टरों की गैरमौजूदगी में इन केंद्रों पर मरीजों को फार्मासिस्ट, एएनएम और अन्य कर्मचारियों के भरोसे इलाज कराना पड़ रहा है। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है और सामान्य बीमारियों के लिए भी बड़ी संख्या में लोग हैलट, उर्सला, केपीएम और कांशीराम अस्पताल का रुख कर रहे हैं।
जिले में 53 अर्बन पीएचसी, 43 ग्रामीण पीएचसी, 247 सीएचओ उपकेंद्र और 93 आयुष्मान आरोग्य मंदिर हैं। इन स्वास्थ्य केंद्रों का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी इलाकों में लोगों को प्राथमिक जांच, सामान्य बीमारियों का उपचार, गंभीर बीमारी की शुरुआती पहचान और जरूरत पड़ने पर सही अस्पताल में रेफर करना है। लेकिन डॉक्टरों की कमी के कारण यह व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
फार्मासिस्ट दे रहे बेसिक दवाएं
डॉक्टरों की अनुपस्थिति में कई केंद्रों पर मरीजों को फार्मासिस्ट ही कुछ सामान्य दवाएं देकर वापस कर रहे हैं। मरीजों को चिकित्सकीय परामर्श और बीमारी की सही पहचान नहीं मिल पा रही है। सर्दी, खांसी, बुखार और अन्य सामान्य समस्याओं से परेशान मरीज भी बड़े अस्पतालों में पहुंच रहे हैं।
इससे पहले से गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे बड़े सरकारी अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टर नहीं होने के कारण मरीजों की स्थिति का आकलन कर उन्हें समय रहते सही अस्पताल में रेफर करने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
कई केंद्रों पर डॉक्टरों की नियमित मौजूदगी नहीं
शिवराजपुर ब्लॉक के डुढवा जमौली, आटी, मुस्ता और बीरामऊ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को लेकर ग्रामीणों ने डॉक्टरों की नियमित मौजूदगी पर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के मुताबिक मुस्ता में सप्ताह में केवल दो दिन डॉक्टर आने की बात सामने आई, जबकि अन्य केंद्रों पर भी डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें हैं। सुखरेज गांव स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिर के लंबे समय से बंद रहने की शिकायत भी ग्रामीणों ने की।
बिल्हौर ब्लॉक के अरौल, नानामऊ, मकनपुर, सैबसू और उत्तरीपुरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी डॉक्टरों की कमी सामने आई। ग्रामीणों के अनुसार नानामऊ केंद्र में डॉक्टर नहीं हैं और वहां फार्मासिस्ट के भरोसे काम चल रहा है। अरौल में भी डॉक्टर की नियमित उपलब्धता नहीं होने की शिकायत है।
चौबेपुर ब्लॉक के राजारामपुर, दुर्गापुर और बंसठी में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं। बंसठी केंद्र में तैनात डॉक्टर कई दिनों से अस्पताल नहीं पहुंच रही हैं। जांच में सामने आया कि डॉक्टर मातृत्व अवकाश पर हैं। डॉक्टरों की पहले से कमी होने के कारण उनकी अनुपस्थिति में किसी अन्य चिकित्सक की वैकल्पिक ड्यूटी भी नहीं लगाई गई है। ऐसे में मरीजों को चिकित्सकीय परामर्श के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है।
इसी तरह सरसौल ब्लॉक में पुरवामीर, शिशुपुर, पाली, नरवल, ड्योढ़ी घाट और हाथीपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। शिशुपुर केंद्र कई महीनों तक बंद रहने के बाद करीब एक सप्ताह पहले फिर से शुरू हुआ है। फिलहाल यहां डॉक्टर के पहुंचने की जानकारी है।
इन दिनों डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और वायरल बुखार के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में प्राथमिक स्तर पर जांच और समय से उपचार नहीं मिलने पर मरीजों की स्थिति बिगड़ सकती है। ग्रामीण, झुग्गी-बस्तियों और निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों के लिए ये स्वास्थ्य केंद्र बेहद महत्वपूर्ण हैं। निजी अस्पतालों का खर्च वहन नहीं कर पाने वाले मरीज इन्हीं केंद्रों पर इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं।
व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
डॉक्टरों की गैरमौजूदगी में गंभीर बीमारियों की शुरुआती पहचान कैसे होगी? 40 से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सकों की कमी कब तक दूर होगी? क्या वैकल्पिक डॉक्टरों की व्यवस्था कर केंद्रों को नियमित रूप से संचालित नहीं किया जा सकता?
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए वॉक-इन इंटरव्यू के जरिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है। अधिकारियों के मुताबिक जल्द ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पूरे समय डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
