मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी की फिल्म ‘Last Man in Tower’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। अरविंद अडिगा के चर्चित उपन्यास पर आधारित यह फिल्म सिर्फ एक पुरानी बिल्डिंग के पुनर्विकास की कहानी नहीं है, बल्कि बदलते शहर, टूटते रिश्तों, लालच, अकेलेपन और अपने सिद्धांतों पर टिके रहने की जद्दोजहद को सामने रखती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं, खासकर मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता।
एक पुराने घर के सामने खड़ा है करोड़ों का लालच
कहानी मुंबई की एक पुरानी हाउसिंग सोसायटी के रिटायर्ड शिक्षक योगेश मिश्रा उर्फ मास्टरजी के इर्द-गिर्द घूमती है। मास्टरजी के लिए उनका घर महज चार दीवारों का ठिकाना नहीं है। उसमें उनकी जिंदगी की यादें, उनकी पत्नी की मौजूदगी और वर्षों से बने रिश्तों की पूरी दुनिया बसती है।
दूसरी ओर बिल्डर धर्मेन शाह इस पुरानी सोसायटी की जगह एक आलीशान टावर बनाने का प्रस्ताव रखता है। सोसायटी के अधिकांश लोगों को इसके बदले मोटी रकम और बेहतर जिंदगी का सपना दिखाई देता है। ज्यादातर लोग इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन मास्टरजी अपना घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते।
यहीं से फिल्म का असली संघर्ष शुरू होता है।
जब एक इंसान पूरे समाज के खिलाफ खड़ा हो जाता है
मास्टरजी का फैसला धीरे-धीरे उन्हें उन्हीं लोगों से दूर करने लगता है, जिन्हें वे कभी अपना मानते थे। शुरुआत में मामला सिर्फ घर बेचने या न बेचने का लगता है, लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते सवाल उठाती है कि आखिर विकास की कीमत क्या होनी चाहिए?
क्या बेहतर जिंदगी के लिए अपनी पुरानी यादों और रिश्तों को छोड़ देना सही है? या फिर अपनी जिद पर अड़े रहना भी एक तरह का स्वार्थ हो सकता है? फिल्म इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं देती।
मनोज बाजपेयी ने फिर साबित की अपनी अभिनय क्षमता
मनोज बाजपेयी ने मास्टरजी के किरदार को बेहद सहजता से निभाया है। उनके अभिनय में ज्यादा शोर नहीं है, लेकिन चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव और शरीर की धीमी भाषा किरदार की बेचैनी को सामने ले आती है।
मास्टरजी कभी जिद्दी नजर आते हैं, कभी अकेले और कभी बेहद भावुक। मनोज इन सभी भावनाओं को बिना किसी अतिरिक्त नाटकीयता के पर्दे पर उतारते हैं। यही उनकी परफॉर्मेंस को खास बनाता है।
दिव्या दत्ता की भूमिका कहानी में भरती है नई जान
दिव्या दत्ता भी फिल्म की मजबूत कड़ी हैं। उनका किरदार सुषमा/संगीता अपने परिवार और खासकर अपने बेटे के बेहतर भविष्य का सपना देखता है। वह मास्टरजी को घर बेचने के लिए मनाने की कोशिश करती है, लेकिन उसके पीछे सिर्फ लालच नहीं है।उसके अपने संघर्ष, थकान, उम्मीद और महत्वाकांक्षा हैं। दिव्या दत्ता इन परतों को बेहद प्रभावी तरीके से सामने लाती हैं। कई मौकों पर उनके चेहरे के भाव ही वह सब कह देते हैं, जिसे संवादों की जरूरत नहीं पड़ती।
कहानी जितनी सरल, अंत उतना ही बेचैन करने वाला
फिल्म की शुरुआत काफी सहज गति से होती है। पहले हिस्से में किरदारों और सोसायटी की दुनिया को स्थापित किया जाता है, जबकि आगे बढ़ते हुए कहानी का तनाव बढ़ने लगता है। जैसे-जैसे मास्टरजी अकेले पड़ते हैं, फिल्म का माहौल भी ज्यादा गंभीर और असहज होता जाता है।
फिल्म का अंत दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोर सकता है। खासतौर पर उन दर्शकों के लिए यह क्लाइमैक्स ज्यादा असरदार हो सकता है, जो कहानी के बारे में पहले से कुछ नहीं जानते
क्या ‘Last Man in Tower’ देखनी चाहिए?
अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज और इंसानी रिश्तों पर भी सोचने के लिए मजबूर करती हैं, तो ‘Last Man in Tower’ आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसकी दमदार अदाकारी और सरल लेकिन गहरे सवाल खड़ी करने वाली कहानी है।
मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता की शानदार परफॉर्मेंस फिल्म को संभालती है, जबकि अंत लंबे समय तक आपके जेहन में बना रह सकता है। यह तेज रफ्तार मसाला फिल्म नहीं, बल्कि धीरे-धीरे असर छोड़ने वाली कहानी है।
