
नई दिल्ली | जनसंवाद टाइम्स
नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर जंतर-मंतर पर पिछले 36 दिनों से चल रहा विरोध प्रदर्शन 25 जुलाई को समाप्त हो गया। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में आयोजित इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी। उनके इस्तीफे के बाद संगठन ने धरना समाप्त करने की घोषणा की।
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में नीट पेपर लीक और अन्य परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और केवल विरोध प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस की कठोर कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने उन याचिकाओं पर भी विचार करने की सहमति दी, जिनमें विरोध के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों की ओर से अपनी बात रखी गई है। इस पर पीठ ने कहा कि हर व्यक्ति का जीवन समान रूप से महत्वपूर्ण है, चाहे वह प्रदर्शनकारी हो या पुलिसकर्मी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए पूरे देश में एक समान प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिससे कानून-व्यवस्था भी बनी रहे और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी सम्मान हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आंदोलन के दौरान केवल भीड़ मौजूद होने भर से लाठीचार्ज जैसी कार्रवाई को उचित नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में आत्म-अनुशासन की आवश्यकता पर बल देते हुए सभी पक्षों से निष्पक्ष सहयोग की अपेक्षा जताई। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को निष्पक्ष सहयोग का भरोसा दिया।
गौरतलब है कि नीट पेपर लीक मामले को लेकर कई राज्यों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए थे। 20 जुलाई को दिल्ली में संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें भी हुई थीं। आरोप है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग किया गया। इस घटनाक्रम के बाद पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है।
