Thursday, October 8, 2026
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अमेरिका में जयशंकर का बड़ा संदेश, ‘तीसरे पक्ष’ वाली बात के क्या हैं मायने?

by Sagar Sharma
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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका में भारत की विदेश नीति और तेजी से बदलती वैश्विक राजनीति को लेकर अहम टिप्पणी की है। उनके बयान में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, अपने विकल्प खुले रखने और अलग-अलग देशों के साथ राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध आगे बढ़ाने पर जोर दिखाई दिया। ऐसे समय में जब दुनिया में प्रमुख शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, जयशंकर की बात को भारत की बदलती कूटनीतिक भूमिका के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

एक देश पर निर्भरता नहीं, कई विकल्पों पर भारत का जोर

जयशंकर की टिप्पणी का सबसे अहम पहलू यह है कि भारत अपनी विदेश नीति को किसी एक देश या शक्ति तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है।

भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और व्यापार में सहयोग बढ़ा रहा है। दूसरी ओर रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध जारी हैं। यूरोप, पश्चिम एशिया, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी भारत के अलग-अलग रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं।

यही व्यापक नीति ‘तीसरे पक्ष’ से जुड़े संदर्भ को समझने में महत्वपूर्ण है।

आखिर ‘तीसरे पक्ष’ से क्या समझें?

जयशंकर की बात को किसी एक नए गठबंधन या किसी खास देश के साथ अचानक बढ़ती नजदीकी के तौर पर देखना उचित नहीं होगा। इसका व्यापक संदर्भ यह है कि मौजूदा दुनिया में देश अपने हितों के अनुसार अलग-अलग साझेदारों के साथ काम कर रहे हैं।

भारत भी अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों के साथ सहयोग कर रहा है। इसे रणनीतिक स्वायत्तता के दृष्टिकोण से देखा जाता है, जिसमें भारत अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपने फैसले अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लेने की कोशिश करता है।

अमेरिका के रवैये में भी बदलाव का जिक्र

जयशंकर ने अमेरिका की पुरानी सोच का उल्लेख करते हुए बताया कि पहले ऐसी धारणा थी कि भारत के पास सीमित विकल्प होने चाहिए। समय के साथ वैश्विक परिस्थितियां बदल गई हैं।आज भारत की अर्थव्यवस्था, बाजार और रणनीतिक भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है। साथ ही अमेरिका भी दुनिया के विभिन्न देशों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ा रहा है।

पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्ते भी अहम

जयशंकर ने अमेरिका-पाकिस्तान समीकरण के संदर्भ में भारत की सुरक्षा चिंताओं का भी उल्लेख किया। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद को अपनी प्रमुख सुरक्षा चुनौतियों में गिनता रहा है।

ऐसे में जब अमेरिका और पाकिस्तान के बीच किसी भी स्तर पर सहयोग बढ़ता है, तो भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं उसके विदेश नीति विमर्श का हिस्सा बनती हैं। भारत चाहता है कि उसके प्रमुख साझेदार आतंकवाद से जुड़ी उसकी चिंताओं को गंभीरता से समझें।

व्यापारिक रिश्तों पर भी नजर

भारत और अमेरिका के संबंधों में व्यापार और टैरिफ का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौते को लेकर बातचीत और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिशें जारी हैं।

जयशंकर के बयान से यह संकेत मिलता है कि रणनीतिक रिश्तों के साथ आर्थिक संबंध भी भारत-अमेरिका साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं।

क्या भारत की विदेश नीति में कोई बड़ा मोड़ आ रहा है?

जयशंकर की टिप्पणी को किसी एक देश से दूरी बनाने या किसी नए अंतरराष्ट्रीय गुट में शामिल होने की घोषणा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें ज्यादा जोर भारत के विकल्प खुले रखने और अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने पर है।

भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन उसके विदेश नीति संबंध केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। यही वजह है कि भारत कई देशों के साथ एक साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग कर रहा है।

बदलती दुनिया में भारत की अगली दिशा

अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस से जुड़े वैश्विक समीकरण, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, व्यापारिक तनाव और सुरक्षा चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रही हैं।ऐसे माहौल में भारत की कोशिश अपने कूटनीतिक विकल्पों को सीमित करने के बजाय व्यापक बनाए रखने की दिखाई देती है। जयशंकर का बयान इसी दृष्टिकोण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

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